11 दिसंबर 2010

सृष्टि की सर्वोत्तम कृति है मानव: कर्णसिंह

सौलधा के सत्संग भवन में प्रवचन सुनाते हुए पंडित कर्ण सिंह ने कहा कि मनुष्य जीवन इस सृष्टि की सबसे अनुपम कृति है। अत: मनुष्य को चाहिए कि वह अपने जीवन को सुधारने के लिए अच्छे कर्म करने के साथ-साथ रामनाम का जाप करे। राम नाम का जाप करने से जहां मनुष्य का मन शुद्ध होता है। वहीं मनुष्य इससे परोपकारी भी हो जाता है।

पंडित जी ने कहा कि मनुष्य को चाहिए कि वह अपनी इच्छाओं को त्याग कर दूसरों के भला ही सोचे और अपने मन को स्थिर करे। इस प्रकार सत्कर्म करने का फल उसे अवश्य मिलेगा और उसका जीवन व्यर्थ नहीं जाएगा।

उन्होंने कहा कि मनुष्य द्वारा श्रेष्ठ लक्ष्य की प्राप्ति में अनेक बाधाएं आना स्वाभाविक है, परंतु मनुष्य अध्यात्म के बल पर सभी बाधाओं को आसानी से पार कर लेता है। अध्यात्म की शक्ति मनुष्य को प्रेरणा देती है कि वह कर्म फल की प्राप्ति के लिए आत्म समर्पण कर दे। साधना करने के परिणाम काफी सुखद होते हैं। हालांकि प्रारंभ में साधना करते हुए मनुष्य को कुछ परेशानियों का सामना करना पडता है परंतु आखिरकार इसके परिणाम काफी सुखद होते है।

उन्होंने कहा कि धर्म जीवन का अभिन्न अंग है और धर्म के सेवन से ही प्रकृति में परिवर्तन आता है और मनुष्य के जीवन में आध्यात्मिक ऊर्जा का आविर्भाव होता है। ईश्वर की उपासना समर्पण भाव से की जानी चाहिए और मनुष्य को चाहिए कि वह अपने अंदर के रोग-द्वेष को अपने विवेक की कैची से काट डाले तभी कल्याण का मार्ग प्रशस्त होगा। इसके लिए मानव को इंद्रियों पर काबू पाना सीखना चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्रियों का संचालन करना मानव को सिखाया है। इंद्रियों का संचालन ही हृदय का गोकुल है।

उन्होंने कहा कि भोजन थाली में होगा तो पेट में भी होगा और अगर थाली ही खाली हो तो पेट भरने की आश छोड देनी चाहिए। कुछ लोग मूर्ति पूजा में विश्वास नहीं रखते, लेकिन इस पूजा से ही अंदर की पूजा तक पहुंचा जा सकता है।

उन्होंने कहा कि अंदर की पूजा को जानने से पहले यानी भगवान को जानने के लिए अंदर की पूजा से पहले बाहर की पूजा बहुत जरूरी है। आंखे जो बाहर देखती है उसी का ध्यान अंदर करती है। इसी प्रकार से कान बाहर से सुनकर उसका अंदर चिंतन करते है इसलिए पूजा की जोत की ज्वाला शरीर के बाहर तक ही नहीं बल्कि अंदर तक भी जानी बहुत जरूरी है।

09 दिसंबर 2010

होम्‍योपैथी क्षेत्र में अपार संभावनाएँ


आज की आपाधापी वाली जिंदगी में बीमारियों ने मनुष्य के शरीर में अपनी पैठ बना ली है, तो लोग भी उनका जड़ से इलाज चाहते हैं। इसके लिए वह होम्‍योपैथी का सहारा लेते हैं। यह एक ऐसी पद्धति है जिसमें उपचार में तो समय लगता है लेकिन यह बीमारी को जड़ से मिटाती है। यही कारण है जिसके कारण यह पद्धति तेजी से लोकप्रिय हो रही है। अगर आप चाहें तो इस क्षेत्र में अपना भविष्य देख सकते हैं।
इस क्षेत्र की खासियत यह है कि यह आर्थराइटिस, डायबिटीज, थायरॉइड और अन्य तमाम गंभीर मानी जाने वाली बीमारियों का प्रभावी इलाज करती है और वह भी बिना किसी साइड इफेक्ट के। आमतौर पर यह धारणा है कि होम्‍योपैथी दवाईयों का असर बहुत देर से होता है, लेकिन ऐसा नहीं है। दरअसल, यह पद्धति केवल पुरानी और गंभीर बीमारियों को पूरी तरह ठीक करने में थोड़ा समय लेती है, अन्यथा बुखार, सर्दी-खांसी या अन्य मौसमी या छोटी-मोटी बीमारियों में होम्‍योपैथिक दवाएँ उतनी ही तेजी से असर करती हैं, जितनी कि अन्य पद्धतियों की दवाएँ।
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भारत में होम्‍योपैथी शिक्षा की शुरुआत 1983 में ग्रेजुएट लेवल और डिप्लोमा कोर्स से हुई। इस समय देश में 186 होम्‍योपैथिक मेडिकल कॉलेज हैं, जिनमें से 35 सरकारी कॉलेज हैं। शेष निजी संस्थाओं द्वारा संचालित हैं। होम्‍योपैथी डॉक्टर बनने के लिए कई कोर्स हैं। इनमें सबसे आरंभिक कोर्स है - बैचलर ऑफ होमियोपैथिक मेडिसिन एंड सर्जरी यानी बीएचएमएस। इनमें प्रवेश के लिए आपको फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी और अंग्रेजी विषयों के साथ कम से कम 45 प्रतिशत अंकों से 12वीं पास होना आवश्यक है।
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बीएचएमएस में प्रवेश पाने के लिए आपको ऑल इंडिया एंट्रेंस एग्जामिनेशन देना पड़ेगा। इस कोर्स की कुल अवधि साढे पाँच वर्ष है जिसमें 6 माह की इंटर्नशिप भी शामिल है। इसके बाद डिप्लोमा इन होमियोपैथिक मेडिसिन एंड सर्जरी यानी डीएचएमएस किया जा सकता है। इसकी अवधि चार वर्ष है। इस क्रम में होमियोपैथ में एमडी भी किया जा सकता है। जिसकी निर्धारित अवधि तीन वर्ष है। यह पोस्ट ग्रेजुएट स्तर का कोर्स है। इसके तहत पीडियाट्क्सि, मेटेरिया मेडिका, होमियोपैथिक फिलॉसफी, रेपर्टरी, साइकियाट्रि‍स्‍ट, फार्मेस आर्गेनॅन ऑफ मेडिसिन आदि में विशेषज्ञता हासिल की जा सकती है। इस क्षेत्र में करियर की अपार संभावनाएँ है। कोर्स करने के बाद आपको सरकारी या निजी अस्पताल में होमियोपैथी डॉक्टर के रूप में नौकरी मिल सकती है।
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इसके अलावा क्लिनिक्स, चैरिटेबल इंस्टिट्यूट, रिसर्च इंस्टिट्यूट, मेडिकल कॉलेजों में भी काम मिल सकता है। इन सभी के अलावा आप खुद का काम भी कर सकते हैं। वाणिज्य संस्थान एचोसैम की रिपोर्ट के आधार पर भारत में होमियोपैथी का बाजार इस समय करीब 12।5 अरब रुपए का है। उम्मीद की जा रही है कि 2010 तक यह 26 अरब रुपए का हो जाएगा। होम्‍योपैथी का बाजार प्रतिवर्ष 25-30 प्रतिशत की गति से आगे बढ़ रहा है।
लोगों के बीच होम्‍योपैथिक चिकित्सा की जितनी मांग बढ़ रही है, उस अनुपात में पर्याप्त चिकित्सक नहीं है। होम्‍योपैथ का एक अच्छा डॉक्टर प्रतिदिन तीन-चार हजार रुपए आराम से कमा लेता है। भारत में एलोपैथी और आयुर्वेद के बाद होमियोपैथी तीसरी सर्वाधिक लोकप्रिय चिकित्सा पद्धति है। हालाँकि, आज यह सबसे तेजी से आगे बढ़ रही है।
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शिक्षण संस्थान:
गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी, दिल्ली
डॉ. बी।आर सूर होम्‍योपैथिक मेडिकल कॉलेज, नई दिल्ली
नेहरु होम्‍यो मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, नई दिल्ली
नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ होम्‍योपैथी, कोलकाता
बैक्सन होम्‍योपैथिक मेडिकल कॉलेज, नोएडा
कानपुर होम्‍योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल, कानपुर नेशनल होम्‍योपैथिक मेडिकल कॉलेज एंड हॉस्पिटल,लखनऊ

आपके अंदाज में है सेक्स अपील

हिन्दी सिनेमा के सबसे सेक्सी दृश्यों को याद करें। शायद आपके आंखों के आगे बारिश में भीगती नायिका की झलक कौंध जाएगी। जिसके कपड़े भीगकर बदन से चिपक गए हों। पारदर्शी कपड़ों से शरीर बाहर झांक रहा हो। इससे भी ज्यादा सेक्सी आपको लगी होंगी शायद उस अभिनेत्री की अदाएं। यह साफ बताता है कि हमारी सेक्सुअल फैंटेसी में शारीरिक भाव-भंगिमाएं यानी कि बॉडी लैंग्वेज की क्या भूमिका है।

शरीर की भाषा और स्त्रियां
अगर स्त्रियों की बात करें तो कई बार कम खूबसूरत स्त्रियां अपनी बॉडी लैंग्वेज के चलते पुरुषों को अपना दीवाना बना लेती हैं। बहुत सी युवतियों की चाल, उनके बैठने, देखने और बात करने का अंदाज भर पुरुषों के भीतर उनके प्रति चाहत भड़काने लगता है। कई बार उनकी आंगिक भाषा से यह अनायास झलकता है और कई बार कुछ स्त्रियों द्वारा जानबूझकर शरीर की भाषा तय की जाती है।
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सेक्सी लुक के प्रति सतर्कता बढ़ी
गौर करें तो हम पाएंगे कि आज के दौर में स्त्रियां अपने सेक्सी लुक के प्रति भी जागरुक हो रही हैं। वे पहले के मुकाबले अपने चलने, उठने-बैठने के तरीके को लेकर ज्यादा सतर्क हो गई हैं। वे पहले की तरह अपनी सेक्स अपील को छिपाती नहीं है बल्कि उसे साफ या कई बार आक्रामक तरीके से सामने भी रखती हैं। पतली कमर, उन्नत स्तन और भरे हुए नितंब उनमें शर्म नहीं गर्व की भावना पैदा करते हैं।

जो दीवाना बना दे...
स्त्रियों के शरीर की बनावट भी ऐसी होती है कि वे उसका इस्तेमाल बड़ी आसानी से पुरुषों के भीतर सेक्स की चाह भड़काने के लिए कर सकती हैं। खास तौर पर उनके वक्ष, कमर और जांघें पुरुषों के लिए हमेशा आकर्षण का विषय होती हैं। इतना ही नहीं स्त्रियों की कुछ हरकतें हमेशा पुरुषों के भीतर काम भावना को भड़काती हैं। मसलन उनके होठों की हरकत, अपनी जीभ पर जुबान फेरना या फिर आहिस्ता-आहिस्ता कुछ खाना भी पुरुषों को दीवाना बना सकता है।

पुरुषों के अंदाज
शरीर की यह भाषा पुरुषों के साथ-साथ स्त्रियों में भी काम करती है। आम तौर पर किसी कमरे में धीमी और सधी चाल से प्रवेश करने वाला पुरुष वहां बैठी स्त्रियों का ध्यान अनायास ही अपनी ओर आकर्षित कर सकता है। यह सधी चाल बताती है कि उसका अपने-आप पर कंट्रोल है। अब पुरुषों का खुद पर कंट्रोल होना सेक्स में कितनी अहमियत रखता है, शायद यह बताने की जरूरत नहीं... कई युवतियों को स्मोकिंग करने पुरुष भाते हैं, भले वे अपने भावी पति का सिगरेट पीना सख्त नापसंद करें।
हालांकि यह सच है कि शरीर की इस भाषा का आज तक कोई सर्वसम्मत व्याकरण नहीं बन सका है। किसी को किसी का कोई भी अंदाज भा सकता है। लड़कियों का अपने बालों की लट उंगलियों से सुलझाना, तो कभी उनकी स्मार्टनेस तो कभी बे-परवाही और कभी एक्सपोज़ करना तो कभी शर्माना...

क्रोध में मनुष्य स्वयं को भूल जाता है

रघुनाथ मंदिर में प्रवचन सुनाते हुए पंडित गोविन्दरामने कहा कि क्रोध में मनुष्य सही निर्णय नहीं कर पाता क्योंकि क्रोध की अग्नि में वह सब अच्छाई बुराई को भूलकर केवल अपने स्वार्थ को देखता है।

पंडित जी ने कहा कि जब भक्त प्रह्लाद ने दैत्य बालकों को संकीर्तन में लगा दिया तो गुरु पुत्र भयभीत होकर हिरण्य कश्यप के पास पहुंचे और उसे कहा कि महाराज प्रह्लाद ने तो सारे बच्चों को ही बिगाड दिया है। यह बात हिरण्य कश्यप से सहन हुई और क्रोधित होकर उसने निश्चय किया कि मैं अपने हाथों से प्रह्लाद का वध करूंगा। वह काला नाग की तरह फुंकारता हुआ उसके विद्यालय पहुंचा।

प्रह्लाद ने अपने पिता को साष्टांग प्रणाम किया और कहा कि पिता जी आप स्वाभाविक नहीं लग रहे हो। आपकी परेशानी का क्या कारण है? क्या मैं आपकी कुछ सहायता करूं? उसने त्रिलोकी कांपती हैं, वृक्षों में फल आ जाते हैं, सागर रत्‍‌नों के साथ खडा हो जाता है, उसका तुम किसकी शक्ति और साहस से विरोधी कर रहे हो। प्रह्लाद ने कहा कि पिता जी शक्ति तो एक ही है। आपके जिस शक्ति से त्रिलोकी कांपती है उस नारायण की शक्ति से।

वहीं, शक्ति सभी का संचालन करती है। आप भी दैवी भाव ग्रहण कर मेरे साथ संकीर्तन कीजिए, आपको शांति मिलेगी। हरण्यकश्पने कहा कि मुझे पता लग गया है कि तेरी मौत नजदीक आ गई है, इसलिए तेरी बुद्धि काम नहीं कर रहीं। प्रह्लाद ने कहा कि नारायण की इच्छा के बिना कोई किसी को नहीं मार सकता। उसने कहा कि जो नारायण मेरे भय से सामने नहीं आती पहले मैं उससे ही निपटूं। बता तेरा नारायण कहां है? मेरे अंदर, तेरे अंदर, मेरे तलवार में, इस खंभे में भी। प्रह्लाद ने बडी विनम्रता से कहा कि सकारात्मक जवाब दिया और कहा कि नारायण तो सभी जगह विद्यमान हैं। हिरण्य कश्यप ने खंभे में पूरी शक्ति से मुक्का मारा। जोर की आवाज हुई,उसने सोचा इसकी बात सच है। तभी भगवान नरसिंह का रूप धारण कर प्रकट होते हैं। प्रह्लाद शांत खडे हैं। उन्हें देखते ही भगवान आवेश में आ जाते है और जोर से हंसते हैं। उनके दांतों से तीव्र प्रकाश निकलता है जिससे हिरण्य कश्यप की आंखें बंद हो जाती है और भगवान उसे पकड लेते हैं।

मुक्तिदायिनी है बाबा विश्वनाथ की काशी

काशी संसार की सबसे पुरानी नगरी है। विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है-काशिरित्ते॥ आप इवकाशिनासंगृभीता:।पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी। जहां श्रीहरिके आनंदाश्रु गिरे थे, वहां बिंदुसरोवरबन गया और प्रभु यहां बिंधुमाधवके नाम से प्रतिष्ठित हुए। ऐसी एक कथा है कि जब भगवान शंकर ने कु्रद्ध होकर ब्रह्माजीका पांचवां सिर काट दिया, तो वह उनके करतल से चिपक गया। बारह वर्षो तक अनेक तीर्थो में भ्रमण करने पर भी वह सिर उनसे अलग नहीं हुआ। किंतु जैसे ही उन्होंने काशी की सीमा में प्रवेश किया, ब्रह्महत्या ने उनका पीछा छोड दिया और वह कपाल भी अलग हो गया। जहां यह घटना घटी, वह स्थान कपालमोचन-तीर्थकहलाया। महादेव को काशी इतनी अच्छी लगी कि उन्होंने इस पावन पुरी को विष्णुजीसे अपने नित्य आवास के लिए मांग लिया। तब से काशी उनका निवास-स्थान बन गई।

एक अन्य कथा के अनुसार महाराज सुदेव के पुत्र राजा दिवोदासने गंगातटपर वाराणसी नगर बसाया था। एक बार भगवान शंकर ने देखा कि पार्वती जी को अपने मायके (हिमालय-क्षेत्र) में रहने में संकोच होता है, तो उन्होंने किसी दूसरे सिद्धक्षेत्रमें रहने का विचार बनाया। उन्हें काशी अतिप्रियलगी। वे यहां आ गए। भगवान शिव के सान्निध्य में रहने की इच्छा से देवता भी काशी में आकर रहने लगे। राजा दिवोदासअपनी राजधानी काशी का आधिपत्य खो जाने से बडे दु:खी हुए। उन्होंने कठोर तपस्या करके ब्रह्माजीसे वरदान मांगा- देवता देवलोक में रहें, भूलोक (पृथ्वी) मनुष्यों के लिए रहे। सृष्टिकर्ता ने एवमस्तु कह दिया। इसके फलस्वरूप भगवान शंकर और देवगणोंको काशी छोडने के लिए विवश होना पडा। शिवजी मन्दराचलपर्वत पर चले तो गए परंतु काशी से उनका मोह भंग नहीं हुआ। महादेव को उनकी प्रिय काशी में पुन:बसाने के उद्देश्य से चौसठ योगनियों,सूर्यदेव, ब्रह्माजीऔर नारायण ने बडा प्रयास किया। गणेशजीके सहयोग से अन्ततोगत्वा यह अभियान सफल हुआ। ज्ञानोपदेश पाकर राजा दिवोदासविरक्त हो गए। उन्होंने स्वयं एक शिवलिङ्गकी स्थापना करके उसकी अर्चना की और बाद में वे दिव्य विमान पर बैठकर शिवलोक चले गए। महादेव काशी वापस आ गए।

काशी का इतना माहात्म्य है कि सबसे बडे पुराण स्कन्दमहापुराण में काशीखण्ड के नाम से एक विस्तृत पृथक विभाग ही है। इस पुरी के बारह प्रसिद्ध नाम- काशी, वाराणसी, अविमुक्त क्षेत्र, आनन्दकानन,महाश्मशान,रुद्रावास,काशिका,तप:स्थली,मुक्तिभूमि,शिवपुरी, त्रिपुरारिराजनगरीऔर विश्वनाथनगरीहैं।

स्कन्दपुराणकाशी की महिमा का गुण-गान करते हुए कहता है-
भूमिष्ठापिन यात्र भूस्त्रिदिवतोऽप्युच्चैरध:स्थापिया
या बद्धाभुविमुक्तिदास्युरमृतंयस्यांमृताजन्तव:।
या नित्यंत्रिजगत्पवित्रतटिनीतीरेसुरै:सेव्यते
सा काशी त्रिपुरारिराजनगरीपायादपायाज्जगत्॥

भूतल पर होने पर भी पृथ्वी से संबद्ध नहीं है, जो जगत की सीमाओं से बंधी होने पर भी सभी का बन्धन काटनेवाली(मोक्षदायिनी) है, जो महात्रिलोकपावनीगङ्गाके तट पर सुशोभित तथा देवताओं से सुसेवितहै, त्रिपुरारि भगवान विश्वनाथ की राजधानी वह काशी संपूर्ण जगत् की रक्षा करे।

सनातन धर्म के ग्रंथों के अध्ययन से काशी का लोकोत्तर स्वरूप विदित होता है। कहा जाता है कि यह पुरी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है। अत:प्रलय होने पर भी इसका नाश नहीं होता है। वरुणा और असि नामक नदियों के बीच पांच कोस में बसी होने के कारण इसे वाराणसी भी कहते हैं। काशी नाम का अर्थ भी यही है-जहां ब्रह्म प्रकाशित हो। भगवान शिव काशी को कभी नहीं छोडते। जहां देह त्यागने मात्र से प्राणी मुक्त हो जाय, वह अविमुक्त क्षेत्र यही है। सनातन धर्मावलंबियों का दृढ विश्वास है कि काशी में देहावसान के समय भगवान शंकर मरणोन्मुख प्राणी को तारकमन्त्रसुनाते हैं। इससे जीव को तत्वज्ञान हो जाता है और उसके सामने अपना ब्रह्मस्वरूपप्रकाशित हो जाता है। शास्त्रों का उद्घोष है-
यत्र कुत्रापिवाकाश्यांमरणेसमहेश्वर:।
जन्तोर्दक्षिणकर्णेतुमत्तारंसमुपादिशेत्॥
काशी में कहीं पर भी मृत्यु के समय भगवान विश्वेश्वर (विश्वनाथजी) प्राणियों के दाहिने कान में तारक मन्त्र का उपदेश देते हैं। तारकमन्त्रसुनकर जीव भव-बन्धन से मुक्त हो जाता है।
यह मान्यता है कि केवल काशी ही सीधे मुक्ति देती है, जबकि अन्य तीर्थस्थान काशी की प्राप्ति कराके मोक्ष प्रदान करते हैं। इस संदर्भ में काशीखण्ड में लिखा भी है-
अन्यानिमुक्तिक्षेत्राणिकाशीप्राप्तिकराणिच।
काशींप्राप्य विमुच्येतनान्यथातीर्थकोटिभि:।।

ऐसा इसलिए है कि पांच कोस की संपूर्ण काशी ही विश्व के अधिपति भगवान विश्वनाथ का आधिभौतिक स्वरूप है। काशीखण्ड पूरी काशी को ही ज्योतिíलंगका स्वरूप मानता है-
अविमुक्तंमहत्क्षेत्रं<न् द्धह्मद्गद्घ="द्वड्डद्बद्यह्लश्र:पञ्चक्रोशपरीमितम्।">पञ्चक्रोशपरीमितम्।
ज्योतिíलङ्गम्तदेकंहि ज्ञेयंविश्वेश्वराभिधम्॥

पांच कोस परिमाण के अविमुक्त (काशी) नामक क्षेत्र को विश्वेश्वर (विश्वनाथ) संज्ञक ज्योतिíलंग-स्वरूपमानना चाहिए।
अनेक प्रकाण्ड विद्वानों ने काशी मरणान्मुक्ति:के सिद्धांत का समर्थन करते हुए बहुत कुछ लिखा और कहा है। रामकृष्ण मिशन के स्वामी शारदानंदजीद्वारा लिखित श्रीरामकृष्ण-लीलाप्रसंग नामक पुस्तक में श्रीरामकृष्णपरमहंसदेवका इस विषय में प्रत्यक्ष अनुभव वíणत है। वह दृष्टांत बाबा विश्वनाथ द्वारा काशी में मृतक को तारकमन्त्रप्रदान करने की सत्यता उजागर करता है। लेकिन यहां यह भी बात ध्यान रहे कि काशी में पाप करने वाले को मरणोपरांत मुक्ति मिलने से पहले अतिभयंकरभैरवी यातना भी भोगनी पडती है। सहस्रोंवर्षो तक रुद्रपिशाचबनकर कुकर्मो का प्रायश्चित करने के उपरांत ही उसे मुक्ति मिलती है। किंतु काशी में प्राण त्यागने वाले का पुनर्जन्म नहीं होता।
फाल्गुन शुक्ल-एकादशी को काशी में रंगभरी एकादशी कहा जाता है। इस दिन बाबा विश्वनाथ का विशेष श्रृंगार होता है और काशी में होली का पर्वकाल प्रारंभ हो जाता है।
मुक्तिदायिनीकाशी की यात्रा, यहां निवास और मरण तथा दाह-संस्कार का सौभाग्य पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रताप तथा बाबा विश्वनाथ की कृपा से ही प्राप्त होता है। तभी तो काशी की स्तुति में कहा गया है-यत्र देहपतनेऽपिदेहिनांमुक्तिरेवभवतीतिनिश्चितम्।
पूर्वपुण्यनिचयेनलभ्यतेविश्वनाथनगरीगरीयसी॥
विश्वनाथजी की अतिश्रेष्ठनगरी काशी पूर्वजन्मों के पुण्यों के प्रताप से ही प्राप्त होती है। यहां शरीर छोडने पर प्राणियों को मुक्ति अवश्य मिलती है।