09 जनवरी 2010

पुरानी चीजें बड़े काम कीं ( Old things made big job )

ई दिल्ली के ऑटो एक्सपो में चमचमाती कारों, व बिकेस के अलावा और भी ऐसे वहां हैं, जो लोनों का ध्यान खीच रहे हैं। यह देश-विदेश में निर्मित ऐसे साइकिलें भी हैं, जिनकी कीमत सुनकर आप हैरत में पद जाएँ। कोई कह सकता है कि आज साइकिलों में कोंगों कि दिल्चिस्पी इसलिए घट गयी है क्योंकि हममे से ज्यादातर लोग इसे परिवहन का सस्ता साधन मानते हैं औ एह कोई ऐसा फैंसी इतेम नहीं है, जिसके लिए आपको कुछ लाख रूपए खर्च करने पडें। यकीन एक्सपो में प्रदशित साइकिलों कीकीमत ढाई लाख रूपए तक है और इनमें 27 तक गियर हैं। इस हफ्ते दिल्ली में शुरू ऑटो एक्सपो में कारों के सेक्शन के बजाय साईकिल के इस सेक्शन ने लोगों का ध्यान कहीं ज्यादा खीचा है।

इसके अलावा यहाँ हर इलाके में चलने लायक बाइक्स भी हैं जो मैदानी व पहाड़ी इलाकों में आसानी से चल सकती हैं। इनके टायर हल्के हैं और इनकी बाहरी सतह एंटी स्किड ग्रिप वाली है। बाज़ार में उभरती साइकिलों की कीमत 5200 रूपए से लेकर 2,50,000 रूपए तक है और साइकिल का यह बाज़ार 25 फीसदी की दर से बढ़ रहा है। संभवतः यही वजह है कि कई कम्पनियाँ फ़ेशनेबल तरीके कि साइकिल बनाने के इस ने कारोबार में आ रहइ हैं ऐसे में कोई अस्चर्या नहीं होता है कि खेल सामग्री बनाने वाली एडिडास और रीबांक जैसे कम्पनियाँ साइकिल इन्डस्ट्री में प्रवेश कर चुकी हैं। इन साइकिलों को तीन हिस्सों में मोड़ा जा सकता है और कार बूट में रखा जा सकता है। इसके अलावा साइकिल इन्डस्ट्री ख़ास महिलाओं के लिए भी साइकिलों का निर्माण कर रही है। हालाकिं, भारत में यह नहीं बात नहीं है, क्योकि यहाँ पहले से लेडीज साइकिलें चलन में रही हैं, जिन्मिन आगे का डंडा नहीं होता, लेकिन नए दौर की इन साइकिलों में आज की महिलायओं की सुविधा के हिसाब से और भी कई खूबियाँ होंगी। साइकिल इन्डस्ट्री में किस कदर बदलाव आ गया है।

पहले साइकिलों को परिवहन के एक सस्ते साधन के रूप में निर्मित किया जाता था, लेकिन आज साइकिल इन्डस्ट्री ने इस दुपहिया वाहन के साथ भी किसी कार के मालिक होने की तरह गौरव के भाव को जोड़ दिया है। इसने अलग तरह की शब्दावली इस्तेमाल की, इसमें कई वैल्यू-बेस्ड सुविधायें जूताई और इस तरह एक साधारण से दोपहिया वाहन जो 80 के दशक के मध्य तक महज 500 रूपए में आता था, उसकी कीमत आज लाखों में पहुँच गई। इसके साथ भी गर्व का भाव जुड़ गया है।


 फ़ंडा यह  है कि.... पुराने उत्पाद की उपयोगिता थोड़ी और बढाएं, साथ ही आधुनिक साज-सज्जा के साथ इसकी कुछ इस तरह से रीपैकेजिंग करें जिससे यह नए दौर के बच्चो या लोगों के हिसाब से मुफीद हो।